Tuesday, October 23, 2007

कुछ नई चार पंक्तीयाँ

कुछ नई चार पंक्तीयाँ


१. दिल मे गेहरा ज़ख्म आज बैठा है यू...
बस जाम-के-जाम खर्च किए जा रहे है !!
तुटे हुए सपने, घूल रहे है हर गिलास मे,
होठो पे रख प्याली, बस पिए जा रहे है..!!

२. इस दिल मे बसकर, कितने आए-गए क्या जाने,
संभलने-से पहले ही ये दिल तोड दिया जाता है..!!
यूही नही मूह मुडता उस मैखाने की तरफ़,
वहाँ हर शराबी अपनी दास्ताँ सुनाने फ़िर आता है..!!

३. इतना दर्द भरा है तेरे उस दामन का साथ..
पता होता तो हम अपनी रुह बचाके रखते..!!
तुझे भूलाने मे शराब इतनी पीनी पडेगी मुझको..
पता होता तो शराब खाना ही जमाके रखते..!!

४. तुझसे मिलते नही हम तो अच्छा होता सनम...
प्याले खर्च होते है, अब तुम्हे भूलाने के लिए!!
क्या करू के हर वक्त, गम होता भी तो नही...
अब बहाने ढूंढते है हम, महफ़िल जमाने के लिए!!

५. कुछ एसा सफ़र कटाँ, के याद बनके रेह गए..
आपका साथ यू रहा, के हम आबाद बनके रेह गए..
कुछ यादे यू बूनी, के खुशी के मैखाने मिले हमे,
ये पल यू छू गए, के जीने के बहाने मिले हमे!!!

- When my heart beats,
Chirag

Saturday, August 4, 2007

कोई नही आएगा

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कोई नही आएगा

दु:खी होने यू धरती पर, अब कोई नही आएगा,
सदीयाँ बीत जाएगी, पर अब पैगंबर नही आएगा ॥

अमन को नज़रो मे उतारकर, जब निकलोगे चमन से,
न कोई घना जंगल, न आबाद घर नज़र आएगा ॥

इस दुनिया से निकलकर, तू जब 'कयामत' को मिलेगा,
न होगी तुझे कप-कपी, पर न आदर कोई आएगा ॥

वो हँसता-खेलता तेरा दिल, हो जाएगा जब पत्थर,
सरीता बहेगी घर-से, पर मिलने सागर नही आएगा ॥

दु:ख आए तो बस दो-चार तेरे आंगन है अब,
तूफ़ानो से बचाने तुझे कोई लल्कार नही आएगा ॥

दोस्तो! सब मिल बैठके उसे पीलो अभी भी,
जगत का ज़हर पिने, अब कोई शंकर नही आएगा ॥

यू तेज़-तरार गज़ल लिख मत ए 'लिखने-वाले',
दुनिया है यू खोई, कि असर न कोई आएगा ॥

कर दो माफ़ इस 'लिखने वाले' को दुनियावालो,
क्या करे की उसकी लाश उठाने, कोई इश्वर नही आएगा ॥
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Friday, July 20, 2007

तेरे जाने के बाद


मेरी ज़िंदगी मे यू, खालीपन-सा क्यो है?
तेरे जाने के बाद, एसा जीवन ये क्यो है?


आरज़ू खिलती थी, हर सुबह तुझे मिलने की,
आज सुबह के किरनो मे, ये चूभन-सी क्यो है?
तेरे जाने के बाद, एसा जीवन ये क्यो है?


मेरे दिल के धडकन मे, तेरा नाम सूनाई देता था,
सोचता था के बावरे मन को, दिवानापन क्यो है?
तेरे जाने के बाद, एसा जीवन ये क्यो है?


उस झील के पानी मे, तेरा चेहरा रोज़ निहारना,
अब अकेले जाना मुश्किल है, ये जकडन-सी क्यो है?
तेरे जाने के बाद, एसा जीवन ये क्यो है?


तेरे साथ बिताए हरेक पल, फ़िर जिने की लालसा है,
पर आज साँसे मेरी अपनी, बनी दुश्मन-सी क्यो है?
तेरे जाने के बाद, एसा जीवन ये क्यो है?


तू जब दिखती तो लगता, के सावन मे बरसे मोती,
आज बिखरे मोती भी पत्झड, के यू दर्पन-से क्यो है?
तेरे जाने के बाद, एसा जीवन ये क्यो है?


तेरे विश्वास के सहारे, उस अलाह के दर सर झुकाया,
उसके कुच्छे मे जाकर अब, उससे अनबन ये क्यो है?
तेरे जाने के बाद, एसा जीवन ये क्यो है?


आज मौत भी गले लगाए, तो कोई गिला नही,
मुझे छोड तुझे ले गया, एसा अलाह का फ़न क्यो है?
मेरे दिल के तुकडे को तो छीन लिया तुने, ए खुदा,
बता फ़िर मेरी धडकन के बिना, मेरा जीवन ये क्यो है?


तेरे जाने के बाद, एसा जीवन ये क्यो है?


When my heart beats,
Chirag

Thursday, June 14, 2007

A Trait to be sometimes Alone

-: A Trait to be sometimes Alone :-

It is always good to have good friends around us. Man is social animal; maybe because he knows he alone cannot be perfect in all senses, or he alone cannot achieve everything that he wishes for. Sometimes, though we feel that we should have left things on our own; because in some critical points of life; only you would understand yourself completely.


In our life, we try to keep ourselves busy with others, we may have come to know that we committed a mistake, but we try to hide it and if it keeps following us in our conscience, we become wise enough to always keep ourselves busy with others, till the time we find an excuse to justify that false action, or till the time the memory of that false act gets washed-off to a remote place in our senses.


One day I was watching my 8 months old niece, Harshi, playing with some toy. She was loosing interest in it and I had to make sure that she does not start crying because she now wanted another one. So I gave her a steel torch; that was with me handy at that time.


As soon as I introduced it to her; with the light ON, she looked at it in wonder. She was thinking what this shiny thing was coming from it. She saw it fall on all the things around her, the sofas, the cupboard, even the TV screen. I think she did not like it, because she started finding the source of it, she started throwing the torch around, then tried to lick it, tried to swallow it, and what not. Suddenly she gave up and threw it as if it had something wrong in it. When I tried to put it in front of her, she just avoided the instrument.


I forgot the incident as I had an important phone call to attend. But after the call, I suddenly saw a surprising change.


In the meantime my niece had accidentally discovered how the switch could be used to turn the light ON and OFF. Immediately a sparkle of amazement crossed her eyes. She now wanted it from me, by hook or by crook. She knew that it had something in it; that she could control on. I put the torch on a high table and she crawled all the way across to reach it. Her excitement was overwhelming, she was ready to risk crawling and climbing through a sofa to reach the new toy.

When she was finally able to switch it on, she cried in sheer excitement. She again tried to switch it OFF, and again turned it ON. She was now paying more attention to the source of the light. She now stared at it, and then when the light hit her eye-lids she immediately switched it off. She had learnt a new thing, a new game, and a new lesson. Little did she know that there is a lesson to learn in it for me too....a lesson she taught me.


I realized that when the first time I gave her the toy, with the light ON, she did not know that the light could be switched off.


She had just to look at the light of the torch and nothing new from it. She lost interest immediately. Similarly when I have people around me who give me advices, who give me suggestions and who try to tell me what is right and wrong; have switched the light ON and given the torch to me. From their side, they have been nice to me, just like I had been nice to my niece since I wanted to entertain her by giving the lit torch.


But by looking from their perspective, I had come to wrong conclusions. Just like my niece tried to throw the torch, lick it and do everything that was utter nonsense with the torch – in a similar manner I may decide for actions which are incorrect for my perspective.


But when she did not give up and on her own learnt that the light can be switched ON and OFF, she handled it better. On the same lines - when I accept all that others had to say; but kept to my own logics and reasoning, I would be better judge.


That’s when we need to be alone sometimes. Sometimes we need to understand such small happening around us on our own. We observe them, but just ignore them. Sometimes on being alone, I am able to think more rationally. It’s easier for me to find out, accept and pledge and avoid mistakes that I may have committed in the past experiences - maybe just because I have nobody around to be ashamed from. So I would digest a hard truth about myself, more easily.


Since my niece discovered it herself, she remembered her findings very well. She tried to show me how it could be done. And when she looked at me and I made an expression of awe. She felt so happy that she started moving her hands up and down in acknowledgement, and I immediately took her in a tight embrace.


I told her, “Thanks dear for teaching this lesson, let me practice this method which you just taught me.”

Tuesday, May 29, 2007

चार रास्ते - A love of its own kind

चार रास्ते - A love of its own kind

"सही है यार, एकदम सही कहा तुमने", अतुल बोला।

"दोस्तो...आपुन तो ऎसैच जीता है। कोई टेंशन नही लेनेका, और ये प्यार-व्यार के चक्कर मे नही पडनेका", सुनिल बोल पडा। और इस बात पर सारे इकट्ठा दोस्त एक साथ हँस पडे।

सुनिल के घर आज पार्टी है, और कही भी क्यो न हो, आज-कल सुनिल की प्यार-से दुश्मनी जाहीर-सी है - जैसे 'दिल चाहता है' के आमीर खान साहब थे।

हर कोई बातो मे मग्न थे। हर किसीके पास बहोत कुछ था केहने-सुनने को। कोई किसीको बता रहा था, कि वो कितना बदला-बदला सा लग रहा है, और कोई किसीको केह रहा था के इतने साल हो गए पर वो बिल्कुल नही बदला।

यही होता है, जब दोस्त ९-१० साल बाद 'Reunion' की पार्टी मे मिलते है।

चुटकुले बने अफ़साने, और अफ़साने बने तराने, जिनमे झुम गई वो हसीन शाम, और याद आने लगे वो पुराने दिन... जब सब खुब मस्ती किया करते थे। बाते हो रही थी सबके ज़िन्दगी की.. कुछ बता रहे थे अपने इतने साल के सफ़र के बारे मे। कुछ हसीन पलो के बारे मे हो रही थी बाते... और कुछ यादगार पलो को फ़िर-से जी रहे थे सारे।

थोडी देर मे उन हसीन पलो को रोशन बनाने, शुरू हुआ वो प्रोग्राम, जो शायद सभी 'Indian Party' का अभिन्न प्रोग्राम है...अंताक्शरी।

गाने गाए जा रहे थे, और सुनिल तो हमेशा गाना गाने मे सबसे आगे रहता। भगवान ने उसके साथ भी खुब मज़ाक किया था। गानो का दिवाना सुनिल, खुद गाते हुए थकता न था, पर उसका सुर इतना मधुर था, के सिर्फ़ उसके दोस्त उसे झेल लेते...हमेशा।

और उसके पसंदीता गाने भी क्या थे..."जाने क्यो लोग प्यार करते है","तन्हा दिल, तन्हा सफ़र","तडप तडप के इस दिल","लडकीयो से न मिलो तुम"....और बहोत लंबी लीस्ट है। और उसके सबसे पसंदीता गाने थे, "झोका हवा का आज भी, जुल्फ़े उडाता होगा ना..", "हर घडी बदल रही है रूप ज़िन्दगी.."। इन गानो के बाद हमेशा उसकी आँखे नम हो जाती थी...नजाने क्यो?

शाम धीरे-धीरे ढल रही थी, गुनगुनाते भवरे अब थोडे थक गए थे... 'ब्रेक' ज़रूरी था। और जो सारे दोस्त एक साथ गप्पे लडा रहे थे, वो थोडी देर के लिए बिखरके, एक दो-एक दो के ग्रुप बनाकर, बातो मे उलझकर, शाम के खाने का मज़ा उठाने लगे।

क्रितीका धीरे-से सुनिल के पास आई और उसके आँखो मे घूरने लगी। जब सुनिल ने उसकी तरफ़ प्रश्नचीन्ह-सा चेहरा दिया, तब जाके वो बोली।

"क्या रे सनी, तू मोपेड-से 'blazing bike' कबसे बन गया?", क्रितीका बोली। 'सनी' सुनिल का प्यारा नाम था। सब उसे यही नाम से बुलाते थे, उसके प्रोफ़ेसर भी।
"ए सनी, तुम बहोत बदल गए हो। तुम्हे पहचानना मुश्किल हो गया है।"

"क्यो? मे तो वही 'oldwalla' सनी हूँ... जो तुम्हारी लंबी चोटी खींचकर भाग जाता था। अब तुमने 'pony-tail cut' कर दिया, तो मे क्या कर सकता हूँ?", यू बोलकर सनी मुस्कुराया।

"नही रे! बात ये नही, यकीन नही आता की तुम्हारी प्यार के बारे मे सोच कुछ अलग ही हो गई है। वो सनी, जो लडकीयो की बाते, थके बिना करता था.... उसे अचानक प्यार मे बेवफ़ाई दिखने लगी? बात कुछ हज़म नही हूई दोस्त।"

"अरे वो? वो तो एसे ही... मे तो मज़ाक-मज़ाक मे यू कुछ गाने गा लेता हूँ, नगमे गुनगुना लेता हूँ।"

"हे सनी, मे तुम्हे बचपन से जानती हूँ। और हमे तो सिर्फ़ ५ साल हुए है contact छुटे हुए, पर तुम कुछ बदले-बदले लग रहे हो।"

"तुम लडकीयाँ ना, एक बार पीछे पड गए, या शक किया, तो सिर्फ़ भगवान बचा सकता है।"

"सनी बात मत घुमाओ, और जल्दी बताओ, what has brought this change in you? वो लडकीयो को college से Juhu beach के सात रास्ते बताने वाला सनी.... अचानक अकेला क्यो चलना चाहता है? तुम एसे 'anti-love campaign' चलाओ... ये कुछ मानने मे नही आता। बोलो कौन है वो, जिसने तुम्हे इतना परेशान किया, सिर्फ़ नाम बताओ और मे उसकी खबर लेती हूँ।"

"हे क्रीटस! इतना समझलो, अपुन कभी ये प्यार-व्यार के चक्कर मे नही पडता, thats not my world, बोलगा तो...!!" 'क्रीटस' क्रितीका का प्यारा नाम था।

"ए सनी! देखो मे ये मानने को तयार नही की हमे प्यार नही होता। और तुम्हे न हो...ये तो एकदम impossible है। और वैसे भी मेरे हिसाब से प्यार की दो मंज़िल है, एक जिसमे हम अपने प्यार को पा लेते है, और दुसरा जिसमे हम अपने प्यार को नही पा सकते।"

"नही क्रीट्स, एसा नही। ये मत कहना की प्यार मे दो राहे है। हर कहानी की यही दो मंज़िले नही। प्यार के रास्ते मे, चार राहे होती है।"

"अच्छा।?। तो हमे भी बताओ ये कौन-सी राहे है?", अपने हँसी को 'control' करते हुए क्रितीका बोली। क्या करे...सुनिल को समझदारी भरी बाते करते हुए सुना नही था... इसलिए शायद हँस पडी।

"ठीक है, तो सुनो! पहली राह वो है, जिसमे तुम्हारा प्यार जीता है, खिलखिलाता है, हँसता है, खेलता है... एक प्यार जो दोनो तरफ़-से पुरा है। उस प्यार के रास्ते मे खुशी है, और जिन्दगी भर साथ निभाने का वादा है, जज्बा है।"
"फ़िर एक राह एसी भी है, जिसमे तुम्हारा प्यार अधुरा रह जाता है, क्योंकि वो दुसरी तरफ़-से अधुरा है। शायद वो प्यार कभी प्यार नही बन सकता, या शायद वो प्यार अभी एक-दुजे को ज़ाहीर भी नही है... और इसलिए अब तक वो अधुरा है।"
"तीसरी राह कुछ एसी भी होती है, जहाँ लोग अभी प्यार को समझ नही पा रहे। वो प्यार को एक जकडन की तरह समझते है। वो अपने प्यार का एहसास नही कर रहे, क्योंकि शायद उनके सामने किसी और का प्यार अधुरा रह गया था। तात्पर्य ये... की अब तक उनकी प्यार से मुलाकात नही हुई।"

"Interesting Philosophy! तुम एकदम उमदा बोलने लगे हो सनी! एक बूक लिख डालो सनी", ये बोलकर क्रितीका फ़िरसे हँस पडी।
"Well ये तीन रास्तो का तो मुझे पता है, अब ये चौथा रास्ता कौन-सा है जनाब, जिसका मुझे पता नही? मे भी तो जानू, और अगर पसंद आए, तो मे उसपे अमल भी कर लूँगी।"

"नही क्रीटस! भगवान न करे कभी तुम्हे उस राह मे चलना पडे", सुनिल उग्र होके बोल पडा।

"ठीक है, ठीक है, माफ़ी मांगती हूँ कुछ भी बक गई, पर उस राह का एक tour तो दो। मुझे बताओ तो सही आखिर उस राह की क्या खास बात है?"

"क्रीटस, प्यार तब पुरा होता है, जब वो दोनो तरफ़ ज़ाहीर हो! पर कभी-कबार ज़िन्दगी मे प्यार एक ऐसी पहेली बन जाती है, कि जिसका जवाब हम ज़िन्दगी भर नही ढूँढ पाते। कभी-कभी कुछ ऐसा हो जाता है, के हम वक्त के आगे अपना सर झुका देते है।"

"एक minute सनी। मे समझ गई तुम क्या केह रहे हो। शायद तुम उन लोगो की बात कर रहे हो, जिनके लिए प्यार एक मज़ाक है, वो प्यार जो उसे हर पाँच लडकीयों मे से एक के साथ हो जाता है। या उन लोगो के लिए, जो प्यार करते तो है, पर डरते है, और ज़माने के सामने झुक जाते है। पर दोस्त, वैसे प्यार को मे प्यार नही कहती। मेरे हिसाबे से तो वो प्यार ही नही होता।"

"नही क्रीटस, जो तुम सोच रही थी, मेरा वैसा मतलब नही था।"

"तो? फ़िर क्या कहना चाहते हो तुम?"

"मे उस पागलपन की बात नही कर रहा था। प्यार की परिव्याख्या तभी पुरी होती है, जब वो दोनो दिलो को मिला लेता है। और दोनो दिल तभी मिलते है, जब वो एक दूसरे का नाम लेके धडकना सिख जाए। और यहींपर.... कभी-कभी वक्त जीत जाता है।"

"यहीं कभी-कबार किसी एक दिल को 'ज़िन्दगी' का साथ नही मिलता। कुछ जाहीर करने से पहले जब ज़िन्दगी किसी एक का साथ छोड दे... तब दूसरा दिल ज़िन्दगी भर एक भवर मे फ़स जाता है। उसे पता नही उसने प्यार खोया है... या पाया है। उसे पता नही की उसका प्यार ज़िन्दा है, या वो कभी था ही नही। उसे पता नही, की उसका प्यार पुरा है...या अधुरा।"

"प्यार अमर है, पर हम इन्सान है। हम प्यार कर सकते है, पर ज़िन्दगी और वक्त पर हमारा कोई बस नही। कुछ एसे लोग होते है जो वक्त, ज़िन्दगी और दिल के इस सबसे बडे सवाल की गुथ्थी मे हमेशा भटकते रहते है। न वो प्यार मे जी सकते है, और न प्यार मे मर सकते है।"
"वो यही जताते है, कि उन्हें प्यार नही। क्योंकि शायद उन्हें प्यार कभी मिलेगा ही नही। वो प्यार मे हँस सकते है, वो प्यार मे रो सकते है.... क्योंकि उन्हें पता नही की उनका प्यार पुरा है, या अधुरा। उन्हें प्यार करने की हिम्मत ही नही है। क्योंकि उनका प्यार आने के पहले ही चला गया... जीने के पहले ही अमर हो गया। पर वो जाते-जाते भी उस दिल के लिए इतने सवाल छोड गया, कि वो ज़िन्दगी-भर कभी प्यार नही कर सकता।"

शाम ढलने को थी। सारे दोस्त अब धीरे-धीरे वापीस चल रहे थे। क्रितीका भी चली गई, उसकी आँखो मे इतने सवाल दिख रहे थे.... पर उनका जवाब सुनिल-से उस दिन मिलना मुश्किल था। वो तो सोच रही थी, शायद उसके जवाब वो फ़िर-से सुनिल से ले पाएगी भी या नही, ये उसको नही पता।

रात को जब क्रितीका ने "Good nite SMS" भेजा तब एक छोटा-सा सवाल पुछा। "ए सनी, फ़िर पुछ रही हूँ... बता कौन थी वो, जिसने मेरे 'लाडूडो'(Gujju word for meaning 'dear') को एसा दर्द दिया है?"

जवाब मे सनी क्या लिखता.... बस एक चार-पंक्ती लिख डाली....


"खुशनसीब है वो.. जिसे मिला अपना प्यार,

बदनसीब है वो.. जिसे मिले बेवफ़ाई,

जो न नसीब को.. न दिल को दोश दे पाया,

सिर्फ़ उसे रास आती है...ये तन्हाई.." ॥२॥


Good night my dear friend and sweet dreams...!!

रात हो गई है। अंधेरा छाया है। सुनिल ने radio FM लगाया...और गाना आ रहा था।

"चिट्ठी न कोई संदेस, जाने वो कौन-सा देस..जहाँ तुम चले गए...!!"

Thursday, May 17, 2007

मेरे दिल की परछाई... मेरी शायरी

मेरे दिल की परछाई... मेरी शायरी


दिल-से निकले कुछ एसे वाकिए...
ढल गए अफ़्सानो के तारे बनकर..
खोए अरमानो के सेज़ पर बनी शायरी..
निकले वो मेरे दर्द के किलकारे बनकर..॥


कुछ एसे ही शेर-ओ-शायरी के मेरे अपने नगमे...
पेश-ए-खिदमत है आपके लिए..

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Bewafaai Shayari.....

१. बहोत है एसे सफ़ेद-पोश दुनिया मे..
जो पड जाते है, 'रेशमी जुल्फ़ो' के जाल मे..
एसे किस्से मिल जाएंगे बहोत ज़माने मे...
जो सदियो की खुशीयाँ खो देते है मैखाने मे..॥

२. मिले नही तुम हमसफ़र, हो गए हम अकेले..
राहगुज़र थे तुम, अब कहाँ चले गए..??
मेरी कश्टी को तो दिखा था बस तुम्ही एक किनारा...
कहा गई तू... मेरे तिनके का सहारा...॥

३. तन्हाई मे यू न तडपा, तुमसे मिलने से पहले..
अब तन्हाई से डरता हूँ तुमसे मिलने के बाद..
रुसवाई सौ झेली, तुमसे मिलने से पहले...
बेवफ़ाई मे मर रहा हूँ तुमसे मिलने के बाद..॥

४. तुमसे क्या छूपाऊ ए दुनियावालो..!!
तुमसे कहा छुपा है मेरा कोई गम..
दिल के आँसू, शायरी मे बयाँ होते है...
कर नही पाता जो मे मेरी आँखे नम..॥

५. हमसे वास्ता न रखो तुम तो अच्छा..
हमे समझने के लिए कई पत्थर काँटने पडेंगे...
बहोत-से दर्द कैद कर रखे है इस सीने मे..
आपको रखू इसमे...तो उन्हे बाटने पडेंगे..॥


६. ज़ाहीर है दुनिया को, मेरे गम के तराने..
दिल का ज़ख्म मेरा.. बनता है ईक फ़साना..
शब्दो मे होते है बयान ये किस्से मेरे जब भी..
वाह-वाह तो करता है..पर हँस देता है ज़माना..॥

७. शराबी से न पुछो, मैखाने का रास्ता..
नशे मे कौन शराबी रास्ता दिखा सका है..
सबसे किमती जो दिल तुट गया हो जिसका..
मैखाना कौन-सा है इसमे उसको क्या रखा है...॥
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Funny Shayari.....

१. हमेशा तो होता है जाम मेरे लबो के साथ..

अकेलापन कहा महसूस होता है उस नशे के बाद..
बूनते है तुम्हारी याद मे ईक पल भी जब हम..
घोलके भूलाते है उसे सोडा या water के साथ..॥

२. खयालो की रोशनी मे, जब तुम नज़र आते हो..
खुदा कसम इस दिल मे एसा, तीर चलाते हो..
हर पल गिनती मे बिताते है, क्या खोया क्या कुछ पाया..
जब तुम मुझे अपने साथ 'shopping' को लाती हो...॥

३. हर पल, पर वक्त..तुझपे एक शायरी..
तुम्हे याद कर-करके लिखता हूँ...
क्या करू के 'घालीब' नमूनो पे न लिखता था..
कसर उसकी आज पूरी मे कर रहा हूँ...॥
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Dosti Shayari.....

१. रिश्तो की कैसी जाल बूनी है खुदा ने..
सोच रहे थे इस भवर मे, क्या खोया, क्या पाया..
जिस रिश्ते मे सिर्फ़ पाना लिखा था खुदा ने..
ऐसे दोस्त को सोचा..और तुम्हारा नाम याद आया..॥

२. बस आपकी दुआ है, के लिख लेते है अक्शर दो-चार..
कोई नही सही, एक आप तो हो समझदार..
बस आपकी दोस्ती का हमे था इन्तज़ार..
अब लगता है पूरी हुई, रिशतो की बहार...॥

३. आपके मुकाबले..हम तो है शायर छोटे-से...
आपकी जनाब, क्या बात की जाए..
इन्सान भले पहोच गया बादल के उस पार..
सुरज पे तो लंबी, झाँकी भी न रख पाए..॥

४. क्या कहानी है वो, जो अक्शरो मे ढल जाए..
कुछ अन्कही बाते..शब्दो मे केह जाए...
फ़साने तो बहोत सुन लेते है ज़िन्दगी मे...
बाते लिख दो ऐसी, जो इस दिल मे बस जाए...॥
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Thanks to my friends 'Sudz' and 'Ashu' who have kept my passion for shayari living...And also for bearing with the ones i share with them. :)


With Regards,

Chirag/Chiru/Chirkut/Chintal/Chiragya

Thursday, May 3, 2007

अभी आ नही सकता..

अभी आ नही सकता..


कुछ बाते दिल की, मे बतला नही सकता,
कुछ आँसू एसे है, जिन्हे बहा नही सकता..

किसीको अपने दिल के घाव, बता नही सकता,
कुछ एसी बेडीयाँ है, जिन्हे खनका नही सकता..

आशाओ की कलियो को, खिला नही सकता,
जी नही सकता.. और मर नही सकता..

सुहाने मौसम मे भी, जी बेहला नही सकता,
हज़ारो रंग हो पर, उनमे रंग नही सकता..

नजाने अंजाने कब एक बात समझा गया कोई,
मे समझता तो हूँ.. शब्दो मे बयाँ नही कर सकता..

न रोने की कसम पे कसम, दे रहा है वो मुझे,
निकलते रेहते है आँसू, उन्हे रोक नही सकता..

निरंतर पिलाता है कोई, और मे पिए जाता हूँ,
पर जाम से जाम, टकरा नही सकता..

नही पता ये निर्बलता है, या है ये पर्वशता,
कुछ पिए बिना रंग मे, आ भी तो नही सकता..

उपर से मेरी मुसीबत, है मेरी ये खुद्दारी,
दुवाए तो है होटो पर, हाथ बढा नही सकता..

जीवन हो या मौत हो, जो आए मुझे बुलाने,
केह दो मे नशे मे हूँ.. अभी आ नही सकता..

यारा.. केह दो मे नशे मे हूँ.. अभी आ नही सकता..

Thursday, March 15, 2007

My poem "When I sat down and...."

Do tell me what do you think about this?
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WHEN I SIT DOWN AND......

When I sit down and imagine,
The pre-sentiment of my own thoughts,
That bleeds pleasure and chagrin,
And my nuances of all sorts.

When I sit down and look back,
To witness miracles of my own rediscovery,
Within my soul and my past days,
Laid a tranquilled man and a forgotten history.

When I sit down, try and feel,
The vibrations of hypnotic sensations,
The metamorphosis of the being in me...
Disposing to world of self-creation..!!

When I sit down and question,
To myself on the transient masters,
That lay in the wealth of experiences,
And in the jinx of success and failures.

When I sit down and re-approach,
How to fag out, my false perceptions,
And accept the reality, so trait so sting...
To the nourished courtliness of perfection.

When I sat down, I understood,
The adventure to caress our desire,
The importance to accustom to struggle,
The brave heart to punish our interior.

When I sat down, I finally surmised,
To STAND UP in life and look up strong,
Supply rich doses of discipline to your self-interest,
And a motivated mind, to stay life-long.


- When my heart beats,
Chirag Khara
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Tuesday, February 27, 2007

A Blog Opening Ceremony

जानन्ति केचिन्न तु कर्तुमीशा:
कर्तुं क्षमा ये न च ते विदन्ति ।
जानन्ति तत्वं प्रभवन्ति कर्तुं..
ते केऽपि लोके विरला भवन्ति...॥


अर्थात्

"Few are the men, who have the privilege to possess right knowledge.
Yet they happen, to remain incapable forever to act in a righteous manner.
While there are others who are capable of action, but deprived from the right knowledge and right vision.
Rarest of all are those who are right in both their knowledge and their conduct too."




“Diya Tale Andhera” – the meaning of these words are "Just below the lantern - lies the darkness". The lantern spreads light all around it. But just below that same lantern, lies total darkness. Where is this “Diya Tale Andhera” in us?

If you were to loose all your teeth you would surely realize of their loss every moment. But do we keep realize their presence every moment.In a similar manner, a fish behaves normally when it is in water. Only when you try to remove it; does it start trembling and get agitated for water and life. We always realize the importance of a thing when we are deprived of it.

In the normal sense, we do not understand the darkness that is dwelling within us – the “Diya Tale Andhera” within us. Only when you will actually begin to face yourself – understand to dare and confess to yourself the absence of rationality in the conduct; that is when you will actually find it in you – the “Diya Tale Andhera” within you!!

When the eyes are closed; even the floodlights cannot bring life to your vision. So dare to see yourself and dare to speak the worst of your conducts to yourself. Once you complete this step, the rationality of thought will bring out the soft being inside you. You are a human being – the most caring animal in this world.

That is why some imperfect people like me who is seeking perfection - starts a blog and wishes that all of his closest friends who have affected his life a lot - give their valuable suggestions, critics and discuss with him - to find the "Diya Tale Andhera" and eradicate it.

Welcome aboard my dear friends...!!

Luv,
Chirag Khara